बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। प्रदेश के 38 जिलों में से 13 जिलों में अल्पसंख्यक मुसलमानों की जनसंख्या
अन्य जिलों की अपेक्षा काफी अधिक है। सीमांचल, चम्पारण और मिथिलांचल के इलाकों के लोकसभा क्षेत्रों में मुसलमान वोटरों की संख्या इतनी जरूर है कि अगर बड़े राजनीतिक दल मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारते हैं तो वे हरगिज कमजोर नहीं माने जायेंगे। संबंधित दल या गठबंधन के कार्यकर्ता यदि इमानदारी के साथ बिना किसी भेदभाव के इनके पक्ष में चुनाव अभियान चलायें तो उनकी जीत की राह कठिन नहीं रहेगी। लेकिन यह खुशफहमी मात्र है। सवाल तो मुसलमानों को प्रतिनिधित्व का है। मुसलमानों के वोट पर दावे के साथ हक जताने वाले दल भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देने के लिए तैयार नहीं हैं। दरअसल ऐसे दल साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं। ऐसे में उन्हे यह गलतफहमी जरूर है कि मुसलमानों को प्रतिनिधित्व जरुरी नहीं है।
दल के अन्दर कुछ ऐसे कमजोर विचार थिंक टैंक भी होते हैं, जो नेतृत्व को यह घुट्टी पिलाने की कोशिश करते हैं कि अगर मुस्लिम उम्मीदवार उतारा गया तो माहौल साम्प्रदायिक हो जायेगा और सीट नहीं निकल पायेगी। ऐसी सोच का मतलब स्पष्ट है कि उन्हे नेतृत्व, स्थानीय नेता और पार्टी कार्यकर्ताओं तथा और समर्थकों पर भरोसा नहीं है। वे केवल मुसलमानों को ही अपना सच्चा और पक्का वोटर समझते हैं। जहां तक देश को साम्प्रदायिकता से बचाने, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की रक्षा का सवाल है तो इसका ठीका सिर्फ मुसलमानों ने नहीं ले रखा है। यह इस लोकसभा चुनाव के लिए एक गंभीर विषय है। अगर उम्मीदवारी के सवाल पर मुसलमानों में निराशा की ज्वाला भड़की तो इस के नकारात्मक परिणाम इस लोकसभा चुनाव के बाद आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में भी सामने आयेंगे।।
✍- - - - - - इमरान सग़ीर
अन्य जिलों की अपेक्षा काफी अधिक है। सीमांचल, चम्पारण और मिथिलांचल के इलाकों के लोकसभा क्षेत्रों में मुसलमान वोटरों की संख्या इतनी जरूर है कि अगर बड़े राजनीतिक दल मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारते हैं तो वे हरगिज कमजोर नहीं माने जायेंगे। संबंधित दल या गठबंधन के कार्यकर्ता यदि इमानदारी के साथ बिना किसी भेदभाव के इनके पक्ष में चुनाव अभियान चलायें तो उनकी जीत की राह कठिन नहीं रहेगी। लेकिन यह खुशफहमी मात्र है। सवाल तो मुसलमानों को प्रतिनिधित्व का है। मुसलमानों के वोट पर दावे के साथ हक जताने वाले दल भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देने के लिए तैयार नहीं हैं। दरअसल ऐसे दल साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं। ऐसे में उन्हे यह गलतफहमी जरूर है कि मुसलमानों को प्रतिनिधित्व जरुरी नहीं है।
दल के अन्दर कुछ ऐसे कमजोर विचार थिंक टैंक भी होते हैं, जो नेतृत्व को यह घुट्टी पिलाने की कोशिश करते हैं कि अगर मुस्लिम उम्मीदवार उतारा गया तो माहौल साम्प्रदायिक हो जायेगा और सीट नहीं निकल पायेगी। ऐसी सोच का मतलब स्पष्ट है कि उन्हे नेतृत्व, स्थानीय नेता और पार्टी कार्यकर्ताओं तथा और समर्थकों पर भरोसा नहीं है। वे केवल मुसलमानों को ही अपना सच्चा और पक्का वोटर समझते हैं। जहां तक देश को साम्प्रदायिकता से बचाने, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की रक्षा का सवाल है तो इसका ठीका सिर्फ मुसलमानों ने नहीं ले रखा है। यह इस लोकसभा चुनाव के लिए एक गंभीर विषय है। अगर उम्मीदवारी के सवाल पर मुसलमानों में निराशा की ज्वाला भड़की तो इस के नकारात्मक परिणाम इस लोकसभा चुनाव के बाद आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में भी सामने आयेंगे।।
✍- - - - - - इमरान सग़ीर



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