लोकसभा चुनाव में मुसलमानों की हिस्सेदारी का सवाल

लोकसभा चुनाव में मुसलमानों की हिस्सेदारी का सवाल

देशभर में आम चुनाव होने वाले हैं। इस बार का चुनाव देश के अमन पसंद और लोकतंत्र पर विश्वास रखने वाले मतदाताओं के लिए काफी अहम है। वर्तमान समय में देश की स्थिति से हम सभी लोग पूरी तरह अवगत हैं। पिछले 5 वर्षों में देश की स्थिति में जो नकारात्मक परिवर्तन आया है  इसके गंभीर परिणाम सामने आये हैं। देश में सांप्रदायिक और अलोकतांत्रिक शक्तियों का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है।

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लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो रहा है। संवैधानिक संस्थाओं को पूरी तरह से कमजोर करने की कोशिश की गई है।सरकार की सारी शक्ति इस पर लगी हुई है कि किस तरह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर बना कर इस पर अपना दबदबा बरकरार रखा जाए और सत्ता में बने रहा जाए। इसके लिए इन शक्तियों को जो भी करना पड़ रहा है इससे वह बाज नहीं आ रही हैं। इसी का परिणाम है कि देश सभी क्षेत्रों में लगातार बिछड़ता जा रहा है। देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। बेरोजगारी की दर बढ़ती जा रही है। किसान परेशान हैं। व्यवसायी वर्ग भी सरकार की नीतियों से नाराज है।कट्टरपंथ से दूर रहने वाली शांतिप्रिय जनता बिल्कुल ही परेशान और निराश है।
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 जहां तक देश के अल्पसंख्यक वर्ग का सवाल है , यह वर्ग हमेशा ऐसी शक्तियों से परहेज करता रहा है जो हिंदुस्तान की धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों को चोट पहुंचाने की कोशिश करती रही हैं और किसी ना किसी बहाने अल्पसंख्यक वर्ग को निशाना बनाते रहती हैं। देश की वर्तमान स्थिति में इस बात का एहसास शिद्दत से हो रहा है कि आजादी के बाद देश में जितने भी आम चुनाव हुए हैं उसके मुकाबले इस साल के आम चुनाव कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय स्तर पर सभी सेकुलर और अमन पसंद अवाम को पूरी तरह एकजुट किया जाए, जिसमें अल्पसंख्यक मुसलमानों की भी संपूर्ण भागीदारी हो। ऐसे में एक ऐसी रणनीति की आवश्यकता होगी जिससे सत्ता पर काबिज सांप्रदायिक शक्तियों की हर वो चाल और साजिश को नाकाम बनाया जा सके जिसे , अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत पैदा करने साथ ही चुनाव के दौरान अल्पसंख्यकों को गोल बंद होने से रोकने के लिए सांप्रदायिक शक्तियों की तरफ से विभिन्न स्तरों पर इस्तेमाल किया जाता है।


 देश की मौजूदा स्थिति पर मुस्लिम सामाजिक संगठनों और मुस्लिम धार्मिक संगठनों की गहरी नज़र है। विभिन्न मुसलिम संगठनों से जुड़े उच्च पदस्थ लोगों ने देश के विभिन्न राज्यों का दौरा किया है। विशेष तौर से राज्य स्तर पर मुसलमानों की अधिक आबादी वाले इलाकों में जाकर यह जानने का प्रयास किया गया है कि मुसलमान लोकसभा चुनाव के बारे में क्या सोचते हैं? स्थानीय उलेमा और प्रबुद्ध मुसलमानों का दृष्टिकोण क्या है? यह बात स्पष्ट है कि वर्तमान केन्द्र सरकार से मुसलमान नाराज हैं। लेकिन एन डी ए के क्षेत्रीय दलों का असर भी में पाया जाता है। प्रबुद्ध मुसलमानों का मानना है कि आजादी के बाद से अब तक सियासत में उचित हिस्सेदारी से उनके वंचित रखा गया है। मुसलमानों का  दृष्टिकोण है कि हमें सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए। मुस्लिमों का मानना है कि एक तरफ सांप्रदायिक शक्तियां गिराने की कोशिश करती है तो दूसरी तरफ सेकुलर कहलाने वाली पार्टियां इसी बहाने मुसलमानों का राजनीतिक शोषण करती हैं और सियासत में हिस्सेदारी से वंचित कर देती हैं। यह एक बड़ा सवाल है जो मुसलमानों को एक प्लेटफार्म पर आने से दूर कर देते हैं। इसका पूरा फायदा सांप्रदायिक शक्तियां उठा  लेती हैं।

अगर हम बिहार की बात करें तो यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी का महागठबंधन और भारतीय जनता पार्टी, जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी का गठबंधन एनडीए के बीच सीधा मुकाबला होगा। एनडीए के घटक दल जनता दल यूनाइटेड जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार जो बिहार के मुख्यमंत्री हैं। इसी तरह एनडीए के अन्य घटक दल रामविलास पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी बीजेपी के साथ हैं। इन दोनों पार्टियां भी मुसलमानों में काफी असर रखती हैं।

इनका मुकाबला करना भी महागठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। इस चुनौती का सामना करने के लिए भी महागठबंधन की पार्टियों को गंभीरता से सोचना होगा। इसके लिए राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी के लीडरों को एक प्रभावी रणनीति की जरूरत है। विशेष तौर से लोकसभा के उन क्षेत्रों के लिए जहां पर मुसलमानों की जनसंख्या अधिक है और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। ऐसे में इस लोकसभा चुनाव में मुसलमानों की हिस्सेदारी के लिए महागठबंधन को सीमांचल, चम्पारण और मिथिलांच  के क्षेत्रों से मुस्लिम उम्मीदवारों को भी टिकट देने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
*साम्प्रदायिकता बनाम वोट बैंक !

बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। प्रदेश के 38 जिलों में से 13 जिलों में अल्पसंख्यक मुसलमानों की जनसंख्या
अन्य जिलों की अपेक्षा काफी अधिक है। सीमांचल, चम्पारण और मिथिलांचल के इलाकों के लोकसभा क्षेत्रों में मुसलमान वोटरों की संख्या इतनी जरूर है कि अगर बड़े राजनीतिक दल मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारते हैं तो वे हरगिज कमजोर नहीं माने जायेंगे। संबंधित दल या गठबंधन के कार्यकर्ता यदि इमानदारी के साथ बिना किसी भेदभाव के इनके पक्ष में चुनाव अभियान चलायें तो उनकी जीत की राह कठिन नहीं रहेगी। लेकिन पहले सवाल तो मुसलमानों को प्रतिनिधित्व का है। मुसलमानों के वोट पर दावे के साथ हक जताने वाले दल भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देने के लिए तैयार नहीं हैं। दरअसल ऐसे दल साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझते हैं। ऐसे में उन्हे यह गलतफहमी जरूर है कि मुसलमानों को प्रतिनिधित्व जरुरी नहीं है। दल के अन्दर कुछ ऐसे कमजोर विचार थिंक टैंक भी होते हैं, जो नेतृत्व को यह घुट्टी पिलाने की कोशिश करते हैं कि अगर मुस्लिम उम्मीदवार उतारा गया तो माहौल साम्प्रदायिक हो जायेगा और सीट नहीं निकल पायेगी। ऐसी सोच का मतलब स्पष्ट है कि उन्हे नेतृत्व, स्थानीय नेता और पार्टी कार्यकर्ताओं तथा  समर्थकों पर भरोसा नहीं है। वे केवल मुसलमानों को ही अपना सच्चा और पक्का वोटर समझते हैं। जहां तक देश को साम्प्रदायिकता से बचाने, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की रक्षा का सवाल है तो इसका ठीका सिर्फ मुसलमानों ने नहीं ले रखा है। यह इस लोकसभा चुनाव के लिए एक गंभीर विषय है। अगर उम्मीदवारी के सवाल पर मुसलमानों में निराशा की ज्वाला भड़की तो इस के नकारात्मक परिणाम इस लोकसभा चुनाव में और आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में भी सामने आयेंगे।।


       इमरान सग़ीर 
+91 80838 65786
               

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